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25 January, 2012

यूँ ठुकरा दिया...

हमने जो कभी हक की तरह माँगा ,
आपने फकीर समझ कर भगा दिया,

बस कुछ हसरते थी दोस्त, तुमने तो, मजाक समझकर,
हर एक हसरत का जनाजा  उठा दिया ,

तेरे गुलशन से मैंने  तो कुछ फूल मांगे थे,
तुमने तो पतझड़ की सूरत, मेरे अरमानो को ही मुरझा दिया

अश्क पोंछने को कहा था मैंने ,
तुमने ये क्या? मुझे और ही रुला दिया .

मेरी बात को, मेरी फुरक़त का अहसास समझ तुमने ,
मेरे अहसासों का मजाक उड़ा दिया..

नहीं थी चाहत, साथ  देने की.
तो फिर क्यों हाथ थामा?
और यूँ ठुकरा दिया..

कोई तो होता ऐसा,.......

कोई तो होता ऐसा,
जो मेरी ज़िन्दगी के हर लम्हे का हिस्सा बनता..

मेरे दिल की हर बात को सुनता गौर से,
मेरे गम को करके दूर ,
मेरा सुकून बनता ,

रात मे जो जलता, मै  तन्हा,
तो अकेलेपन की आग बुझाने ,
वो बारिश बनता,

दर्द में भीगती, जो मेरी पलके,
तो उनके पोंछकर,
वो मेरी मुस्कान बनता,

करता गलती में खुद,
और जो रूठ जाता, मुझे मनाने की खातिर
वो मेरी रूह बनता .

हारकर, जो करता कभी न जीने की तमन्ना,
वो सिखा कर जीना,
मेरी ज़िन्दगी बनता..!!

दो पन्नो से ज्यादा देखा है???

अक्सर इन्सान  कहता है,
मेरी हयात(जिंदगी) ....
"एक खुली किताब की तरह है "

क्या कभी किसी ने ,
खुली किताब को,
 दो पन्नो से ज्यादा देखा है???

जमाने का हर शक्स ,
खुद में पोशीदा नज़र आता है.

क्या तुमने,
किसी शक्स की, किताब में लिखे ,
"हर एक अफसाने का सच देखा है"'???

तन्हा शाम ......

सितम ढाने को बड़ी मुद्दत बाद ,
आज ये शाम आयी है ...

सुकून की ठंडक थी,
की दिल को जलाने, यादों के अंगारे साथ लायी है.

सुहानी धूप खिली थी आंखो मे,
ये काली घटायों को साथ लायी है,

बड़ी मुश्किल से जोड़ा है, खुदको ,
ये फिर बिखेरने आयी हैं.. 

मेरा खुश होकर जीना गवारा नहीं ,
तभी तन्हाई के घूँट पिलाने आयी है.!! 

सितम ढाने से अदावतें नहीं,,

शायद मुझे ही हुनर ऐ रफाकत नहीं,                            
हर दोस्त जुदा है, मुझसे,                                           
मुझे ही ताल्लुकातों की हिफाजत नहीं...                                      

अब राब्ते नहीं ,                                                         
वो शरारते नहीं,                                                          
दरमियाँ अह्बाबो के, बाकी वो चाहते नहीं..

वफ़ा निभाने की अब बातें  नहीं,
बाकी अब बज़्म की राते नहीं,                                   
मयस्सर हो , मोहब्बत के बदले मोहब्बत ,                                    
के ऐसी कोई रवायते नहीं,                                                              

अपनों की नवाज़िशे नहीं,                                                         
जुस्तजू(चाहत) के जुल्म बंद हो यारों का,,                               
मगर, शायद अब भी यारों को,                                                
सितम ढाने से अदावतें(नफरत)) नहीं...!!!   

हुनर ऐ रफाकत=दोस्ती का हुनर 
ताल्लुकातों= संबंधो  
 राब्ते=रिश्ते
अह्बाबो=दोस्तों
 बज़्म=महफ़िल
मयस्सर=पाना/मिलना
रवायते=रस्मे
नवाज़िशे= प्यार/दया
 जुस्तजू=चाहत
  अदावतें= नफरत

21 January, 2012

आँख भर आयी .......

बरसों पहले इक यार  को जाते देखा था,
जमाने से,

आँख मेरी भर आयी थी,
लबों को चीरकर एक चींख बाहर आयी थी,

दिल ने बड़ी गहरी चोट खायी थी, 
उस अपने को खोकर ताउम्र तड़पने की सजा मैंने पायी थी...

फिर आँखों ने देखे यूँ नज़ारे तो कई..

पर आज! 
इक अनजान को रुखसत होते देख,
 ना जाने क्यों ?
फिर आँख भर आई थी 






17 January, 2012

वो सपने देखना गुनाह था........

वो सपने देखना गुनाह था शायद,
के अब तक सजा पा रहा हूँ  ,


बहुत तलब थी, महफ़िलों की,
अब तो बस वीरानो के शौक फरमा रहा हूँ


मेरा मुक़द्दर , हुआ बरहम (नाराज) मुझसे ,
के अब तक मना रहा हूँ,

टूटे ख्वाब, शीशे की सूरत चुभे कभी आँखों में,
के अब तक खून के कतरे  बहा रहा हूँ ,

जिस्म पर गम,
 गुबार ऐ रहगुजर (रास्ते की धूल ) की तरह हुआ काबिज़,
के अब तक हटा रहा हूँ,

आग ऐ दोजख(नरक की आग) सी हुई ज़िन्दगी मेरी,
के अब तो बस कुछ हसरतों का बहाना लिए जले जा रहा हूँ.....

हमसफ़र नहीं मिलता,...

दुस्वरियो के सफ़र में,
 कोई भी हमसफ़र नहीं मिलता,

हर लम्हा भीगती है पलके,
पर अश्क पोछने को एक हाथ भी नहीं मिलता,

टूटकर बिखरता है ,
ये जिस्म हर कदम पर,
लेकिन आराम की खातिर एक दरख़्त भी नहीं मिलता,

जख्म तो है हर कदम पर यहाँ,
पर दे जो मलहम, ऐसा कोई भी नहीं मिलता ,

हर शाम तन्हा और शब् तो काली है,
लेकिन यहाँ खुबसूरत सवेरा नहीं मिलता,

ऐसी, ये हयात के गम तो है,
मगर जब तक चलती है साँस,
यहाँ ख़ुशी का एक कतरा भी नहीं मिलता.!!

एक लम्हा भी नहीं लगता,,,,

एक  जमाना  बीता, हर किसी को मनाने में,
पर हर किसी को सुकून मिला तो,
सिर्फ मुझसे रूठ  जाने में..

ख़ुशी देनी चाही जिन्हें  हमने,
उन्हें मिली ख़ुशी तो,
बस हमे ग़मगीन करके जाने में..

हर एक अश्क का कतरा छीन लिया,
जिनकी  आँखों से, उन्हें दर्द भी न हुआ ,
मुझे रोता छोड़ जाने में ..

साथ दिया जिनका हर लम्हे पर,
 एक भूल क्या की, उन्हें तरस भी न आया,
हमें अकेला कर जाने में ..

अब तो डरते है हम, किसी को भी अपना बनाने में,
 क्यूंकि एक लम्हा भी नहीं लगता किसी को.
मुझे पराया कर जाने में....

अहसास नहीं होता ,,,,,,,,

वो क्या जाने वादों की अहमियत,
जिन्हे वादे तोड़ देने का,  अहसास भी नहीं होता..

क्या समझेंगे, मेरे अश्को की कीमत वो,
जिन्हें मेरी तड़पती आँखों का, अहसास ही नहीं होता..

जख्म दिल के दिखाए भी मैंने,  तो किसे,
जिन्हें मेरे दर्द ऐ दिल का, अहसास ही नहीं होता..

तन्हाई में जले भी तो, उनकी ही यादों के चिराग,
जिन्हें मेरी वीरानियो का, अहसास नहीं होता.....





13 January, 2012

आखिरी अहसास............

जिन-जिन से मिले आज हम,
उनसे ये मुलाक़ात, आखिरी मुलाक़ात न हो जाये.

जिन-जिन से हुए मुखातिब आज हम,
 उनसे की बात, आज आखिरी बात न हो जाये ,

जिन-जिन से निगाहें मिलाई आज हमने,
उनका दीदार आज आखिरी दीदार न हो जाये,

लगता हैं,
आज जो सोये हम,
कही ये नींद भी आज आखिरी नींद न हो जाये ..

.  

10 January, 2012

निभा कर देखे अब रफाकत

हर  ताल्लुकात निभा  कर देखा,  


बस बेवफाई  ही  मयस्सर   हुई  है ...




चलो  निभा  कर  देखे,  अब  रफाकत  ..


के   वफ़ा  की  खुशबु, बस  इन्ही  ताल्लुकातों  में  बची  हैं .

सफ़र ऐ मंजिल मे हूँ कहाँ????????

कतरा-कतरा कर, 
हौसलों का ये समंदर भर रहा हूँ..


दुस्वारिया ओ अजार की गर्द  को दरकिनार कर , 
ख्वाब देखने की आजमाइश कर रहा हूँ ..


कुछ धीरे ही सही , 
पर एक एक कदम कर,
आगे तो बढ़ रहा हूँ ..


सफ़र ऐ मंजिल मे हूँ कहाँ ??
ये तो नहीं मालूम ,
पर हर दिन गुजरी गाह से आगे बढ़ रहा हूँ .....

05 January, 2012

ओ सुनो, ग़ज़ल लिखने वाले ...

ओ  सुनो, ग़ज़ल लिखने वाले .......

जब स्याही कम हो जाये, तब तुम कलम हमारी ले जाना ..

जब अल्फाजो का दरख़्त सूखे, तो बहार मुझसे ले जाना ..

पसंद है, गजलों की बारिश मुझको,

जब साफ़ हो, आसमां तेरी गजलों का,

तब बारिश करने को,  कुछ अब्र- ऐ- दर्द मुंझ से ले जाना "

04 January, 2012

ज़िन्दगी ये अपनी शज़र हो गई .........

ज़िन्दगी  ये  अपनी  शज़र  हो  गई ,
 रफाकात, रफाकात  ना  रही,  के  परिंदा  हो   गई .

जो  आये  मौसम  बहार  के,  डालियाँ  भर  गई ,
 आते  ही   मौसम  ऐ  पतझड़ , यार  हुए  यु  गम  के जैसे  सहर    हो   गई ..

एक गलती की ... ..

जहाँ  से गुजरे , भले ही गुलाब न खिला सके .
पर कुछ खार जरुर कम करते गये,

लाख नेकियाँ कर अजनबी थे ,
जमाने में,

एक गलती की ...

फिर अपनी बदनामी के चर्चे ,
ज़माने वाले करते गए .......

जिंदा हूँ मैं .....

ऐ ज़माने,
ना दे गम मुझको इतना,
के गम की बस्ती का ही बाशिंदा हूँ मैं,,

ना बिछा  खार राहो पर,
 उड़ना आता है मुझको,
के आसमान से टूट कर गिरा  परिंदा हूँ मैं,,

सोच कर सितम करना ज़माने वालो मुझपे,
के तेरे ही बादशाह का बन्दा हु मैं,,

मेरी तन्हाई और ख़ामोशी पर,
खुश मत हो ज़माने, मरा नहीं, 
के अभी  जिंदा हूँ  मैं 

मेरी बज़्म याद आएगी.......

मेरे रुखसत होते ही,
ज़माने को मेरी कमी महसूस हो जाएगी ,

यादे जब भी करेगी परेशान,
आँखों को दीदा ऐ तार कर जाएगी,

जब चाहोगे के, कोई मनाये,
अपने रूठने की , वो अदा तडपायेगी,

शब् ऐ फुरक़त में जब जलोगे तन्हा,
मेरी बज़्म याद आएगी..

खारों की नोंक से मलहम लगते है ..

ये अहबाब भी,
क्या खूब दोस्ती निभाते है,

गुलशन के ख्वाब दिखा,
ज़िन्दगी को वीरान कर  जाते है,

ज़ख्म देकर नहीं मिलता सुकून जब,
तो  खारों की नोंक से मलहम लगाते  है ..

अपनों के ही सताए हुए है,

क्या करे गेरों से गिला ,
हम तो अपनों के ही सताए हुए है,


क्या करे उम्मीद,
 अब साहिल पर आने की, जब अपनों के ही डुबाये हुए है,


कैसे करे ऐतबार? के जमाना करेगा बावफाई,
जब अपनों से ही धोखा खाए  हुए है,


हो जायेंगे जलकर राख,
पर  ना कहेंगे,  के  अब बारिश कर,
जब अपनों के ही जलाये हुए है,


क्यों कहु? के पोंछ दो ये अश्क मेरे,
जब ये अपनों के ही तोहफे मे आये हुए है,


तन्हा कट ही जायेगा, ये सफ़र ज़िन्दगी का,
क्या मांगू अब साथ किसी का, 
जब ये वीराने अपनों के ही सजाये हुए है,






 .

ऐ यारों हमदर्दी क्यों.??

ना रोको,
मेरी चश्म से छलकते,
इस दरिया ऐ अश्क को,


ऐ  यारों हमदर्दी  क्यों.??


आखिर ये अंजाम है तो,
तुम्हारी ही बारिश ऐ सितम का..

किताब का वो इक पन्ना

किताब का वो इक पन्ना ,
भीगने की  हसरत लिए,
 आज फिर मेरी आँखों तले आया है,

अँधेरी रात मे, कराने दीदार अपना ,
यादो के चिराग भी साथ ले आया है,

कुछ इबारते शरारतों में भीगी,
के कुछ गम में डूबी , 
कहु के , सितम ढाने के सामान साथ ले आया है,


भीगते भीगते, बह न जाए तहरीर कही के,
साथ अपने वो छतरी  ले आया है..

यार भी मिले,

यार भी मिले, 
तो गुल ऐ खुर्शीद की तरह ...


जहाँ- जहाँ दिखा ख़ुशी का आफ़ताब,
वहां के हो लिए.

बुझा दिया है हमने,

ऐ सितमगर ज़माने,
 ना कर  इन "मुन्तजिर निगाहों" से मेरे जलने का इंतज़ार ...


अब मुस्कराहट की बारिश से, बुझा दिया है हमने,
"शोला ऐ गम"

ना करना कभी आजमाइश

ना करना कभी आजमाइश,
 मेरी गुजरी हयात के पन्नो को पलट कर पढने  की ,




हर लफ्ज़ दर्द की स्याही से लिखा है ,


तेरे अश्को से इबारते ऐ गम कही बह ना जाये 

03 January, 2012

हयात जन्नत बन जाती है,

कभी टूटे खवाबो की यादे नींद उड़ा देती है ,
तो कभी अधूरे  खवाबो को पूरा करने की हसरत,
नींद से जगा देती है


कभी हौसलों की चमक इतनी, 
कि शब् को सहर बना देती है,
कभी हो जाये इतनी कम के, 
हीरे को कोयला बना देती है,


हर काम में हो  मोहब्बत की खुशबू तो ,
बेकार गुल को गुलाब बना देती है,
और, आ जाये बू  ऐ अदावतें तो,
चमन को वीरान बना देती है,


ईमान ओ करम से जियो तो,
हयात  जन्नत हो जाती है,
जो पड़ी कुफ्र की परछाई तो ,
हयात दोजक हो जाती है,


आज ये मेरा दिल उदास है,,

संग अपने अँधेरी रात है ,
ये आलम भी तनहा ओ चुपचाप है,
के आज ये मेरा दिल उदास है,,

यारो की बारिश ऐ कहर में मिले जो जख्म,
वो तो भर गए कल ही ,
पर फिर दाग देखकर आज ये मेरा दिल उदास है,,

मुझे रही बेवफाई से अदावतें हरदम ,
गम  ने तो निभाई वफ़ा,
पर वक़्त ऐ फरहत की जफाये,
देखकर आज ये मेरादिल उदास है ,

हर ख्वाब टूट गया,
हुया मेरी खुआविशों का क़त्ल,
और ताखिर  खुशियो की याद
फिर आज ये मेरा दिल उदास है